विशेष संवाददाता यूपी, ओमकार की खास रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने सत्ता संभालते ही राज्य में ‘भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन’ और ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का उद्घोष किया था। मुख्यमंत्री का स्पष्ट निर्देश रहा है कि जनता के कार्यों में बाधा डालने वाले और रिश्वतखोरी में लिप्त अधिकारियों व कर्मचारियों पर बुलडोजर जैसी कठोर कार्रवाई होगी। लेकिन, उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की कोतवाली पुलिस की कार्यशैली ने इन दावों पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। उन्नाव कोतवाली वर्तमान में जनसेवा का केंद्र कम और ‘सत्यापन’ के नाम पर अवैध वसूली का अड्डा अधिक प्रतीत हो रही है। यहाँ पुलिसकर्मियों ने कानून की मर्यादा को ताक पर रखकर भ्रष्टाचार का एक ऐसा “रेट कार्ड” तैयार कर लिया है, जो आम आदमी की कमर तोड़ रहा है।
अवैध वसूली का ‘सिंडिकेट’ और मुख्य चेहरे
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, उन्नाव कोतवाली में तैनात दो सिपाहियों—कुलदीप और सोनू—ने थाने के भीतर ही अपना एक समानांतर भ्रष्टाचार तंत्र स्थापित कर रखा है। इनके साथ कुछ अन्य पुलिसकर्मी और बिचौलिए भी इस खेल में शामिल हैं। यह गिरोह सीधे तौर पर आम नागरिकों, अधिवक्ताओं और उन लोगों को निशाना बनाता है जो अपने किसी परिजन की जमानत या चरित्र सत्यापन (Police Verification) के लिए कोतवाली आते हैं। सरकारी काम को अधिकार समझने वाले आम लोगों को यहाँ कदम-कदम पर अपमान और आर्थिक शोषण का सामना करना पड़ रहा है।
₹2500 से ₹5000 का ‘रेट कार्ड’
हैरानी की बात यह है कि इस कोतवाली में भ्रष्टाचार चोरी-छिपे नहीं, बल्कि खुलेआम एक व्यापार की तरह चल रहा है। किसी भी व्यक्ति का पुलिस सत्यापन या जमानतदार का सत्यापन तब तक आगे नहीं बढ़ता, जब तक कि कुलदीप और सोनू जैसे सिपाहियों की “जेब गरम” नहीं की जाती।
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हफ्तों का इंतजार: यदि कोई व्यक्ति पैसे देने से इनकार करता है या नियम-कायदे की बात करता है, तो उसका सत्यापन जानबूझकर हफ्तों तक रोक दिया जाता है। उसे चक्कर लगवाने के बहाने मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।
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तत्काल सेवा: वहीं, जैसे ही ₹2500 से ₹5000 तक की मांग पूरी होती है, वही फाइल जो हफ्तों से धूल फांक रही थी, अचानक कुछ ही घंटों में “क्लियर” कर दी जाती है।
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वकीलों के साथ दुर्व्यवहार: यहाँ तक कि न्यायालय के कार्यों में मदद करने वाले वकीलों को भी इस भ्रष्टाचार से अछूता नहीं रखा गया है। वकीलों के माध्यम से आने वाले मामलों में भी ये सिपाही अपना हिस्सा मांगते हैं, जिससे न्याय प्रक्रिया में भी अनावश्यक देरी होती है।
सुरक्षा व्यवस्था के साथ बड़ा खिलवाड़
यह मामला सिर्फ चंद रुपयों के भ्रष्टाचार का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर समाज की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। पुलिस सत्यापन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि किसी व्यक्ति का पिछला रिकॉर्ड कैसा है या कोई जमानतदार विश्वसनीय है या नहीं। यदि पुलिसकर्मी चंद नोटों के बदले किसी की भी फाइल पर “सही” की मुहर लगा रहे हैं, तो यह सोचना भयावह है कि क्या अपराधी भी इसी रास्ते से अपनी ‘क्लीन चिट’ प्राप्त कर रहे होंगे? अगर किसी शातिर अपराधी का आपराधिक इतिहास पैसों के दम पर दबा दिया जाता है, तो इसके लिए जिम्मेदार सीधे तौर पर कोतवाली के ये कर्मचारी होंगे। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ कानून का रक्षक ही अपराधियों का सबसे बड़ा मददगार बन बैठा है।
कोतवाली प्रभारी की भूमिका पर सवाल
इतने बड़े स्तर पर चल रहे भ्रष्टाचार की गूंज कोतवाली प्रभारी चंद्रकांत मिश्रा के कानों तक न पहुँचती हो, यह नामुमकिन लगता है। जिले की सबसे महत्वपूर्ण कोतवाली के भीतर जब दो सिपाही खुलेआम वसूली कर रहे हों और आम जनता त्रस्त हो, तो प्रभारी का मौन रहना कई संदेह पैदा करता है। क्या कोतवाली प्रभारी इन सिपाहियों को संरक्षण दे रहे हैं? क्या इस वसूली का हिस्सा ऊपर तक जाता है? यह सवाल आज उन्नाव की जनता पूछ रही है। जब पीड़ित पक्ष ने अपनी पहचान गुप्त रखते हुए यह जानकारी दी है कि बिना पैसे दिए काम संभव नहीं है, तो यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी जम चुकी हैं। प्रभारी की शिथिलता और अपने मातहतों पर नियंत्रण न होना यह दर्शाता है कि कोतवाली के भीतर अनुशासन पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।
असहाय जनता और कानून का उपहास
एक तरफ वह मध्यमवर्गीय और गरीब व्यक्ति है जिसकी मेहनत की कमाई इन सिपाहियों की भेंट चढ़ रही है, और दूसरी तरफ वह न्यायप्रिय समाज है जो कानून की दुहाई देता है। जो लोग पैसे देने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें “गुनाहगार” जैसा व्यवहार झेलना पड़ता है। यह स्थिति न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि उत्तर प्रदेश पुलिस की उस छवि को भी धूमिल करती है जिसे सुधारने के लिए शासन स्तर पर करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं।
पुलिस अधीक्षक जय प्रकाश सिंह के सामने चुनौती
उन्नाव के वर्तमान पुलिस अधीक्षक जय प्रकाश सिंह के सामने अब यह एक बड़ी चुनौती है। उनकी छवि एक अनुशासित अधिकारी की रही है, लेकिन उनके जिले की नाक के नीचे चल रहा यह खेल उनके नेतृत्व पर भी सवाल खड़ा कर रहा है।
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क्या सिपाही कुलदीप और सोनू जैसे भ्रष्ट कर्मियों को तत्काल निलंबित कर उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जाएगी?
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क्या उन पीड़ितों को न्याय मिलेगा जिन्होंने भ्रष्टाचार के आगे घुटने टेकने से बेहतर अपनी शिकायत दर्ज कराना समझा?
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क्या कोतवाली प्रभारी चंद्रकांत मिश्रा की जवाबदेही तय की जाएगी?
उन्नाव कोतवाली में हो रहा यह भ्रष्टाचार केवल दो सिपाहियों का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम के सड़ने का संकेत है। अगर आज इन पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में जनता का पुलिस और कानून से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपनी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की वास्तविकता देखने के लिए उन्नाव कोतवाली की गहन जांच करानी चाहिए। खाकी की साख बचाने के लिए इन ‘सफेदपोश’ अपराधियों का खाकी से बेदखल होना अनिवार्य है।
अब देखना यह है कि क्या “न्याय” के मंदिर (कोतवाली) से इन “लुटेरों” की विदाई होगी या भ्रष्टाचार का यह दीमक व्यवस्था को खोखला करता रहेगा?

